“वाइब हैकिंग” (Vibe Hacking) इन्फ्लुएंसर्स द्वारा—भावनात्मक हेरफेर और झूठी कथाओं का उपयोग कर जनमत को प्रभावित करना—भारत में एक बढ़ती हुई समस्या है। वर्तमान कानून जैसे आईटी अधिनियम, उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम और ASCI दिशानिर्देश आंशिक सुरक्षा प्रदान करते हैं, लेकिन प्रवर्तन की कमी के कारण भ्रामक सामग्री अक्सर गंभीर आपराधिक दायित्व से बच निकलती है। मज़बूत वैधानिक सुधारों की तत्काल आवश्यकता है।
परिभाषा
सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर्स द्वारा भावनात्मक हेरफेर और झूठी कथाओं (False Narratives) का प्रयोग कर जनता की राय को प्रभावित करना।
तकनीकें
प्रभाव
उपभोक्ता व्यवहार, राजनीतिक राय और सार्वजनिक विश्वास पर गहरा असर।
भारत में वर्तमान कानूनी स्थिति
1. सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (IT Act)
कमी: झूठी कथाओं या वाइब हैकिंग पर कोई स्पष्ट प्रावधान नहीं।
2. उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 2019 एवं CCPA दिशानिर्देश (2022)
कमी: इन्फ्लुएंसर्स “व्यक्तिगत अनुभव” के नाम पर झूठी बातें प्रचारित कर सकते हैं।
3. ASCI (Advertising Standards Council of India) कोड
पारदर्शिता आवश्यक।
कमी: दंड केवल चेतावनी या कंटेंट हटाने तक सीमित।
4. भारतीय दंड संहिता (IPC)
कमी: डिजिटल संदर्भ में इरादे को साबित करना कठिन।
उभरती चिंताएँ
क्या होना चाहिए?
1. IT Act में संशोधन
झूठी कथाओं और वाइब हैकिंग पर स्पष्ट प्रावधान।
2. एआई प्रकटीकरण अनिवार्य
सिंथेटिक कंटेंट पर वॉटरमार्क/लेबल।
3. कड़ी आपराधिक जवाबदेही
4. विशेष नियामक संस्था
इन्फ्लुएंसर जवाबदेही हेतु CCPA/ASCI के अंतर्गत।
5. प्लेटफ़ॉर्म जिम्मेदारी
भ्रामक कंटेंट होस्ट करने पर प्लेटफ़ॉर्म पर दायित्व।
निष्कर्ष
भारत का वर्तमान ढाँचा इन्फ्लुएंसर दुरुपयोग को मुख्यतः उपभोक्ता संरक्षण का मुद्दा मानता है, न कि आपराधिक अपराध। लेकिन वाइब हैकिंग और झूठी कथाओं का समाज पर गंभीर प्रभाव देखते हुए, IT Act और संबंधित कानूनों में व्यापक संशोधन आवश्यक है ताकि डिजिटल विश्वास, साइबर सुरक्षा और लोकतांत्रिक विमर्श सुरक्षित रह सके।
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