न्यायिक प्रक्रिया में AI का जिम्मेदार उपयोग: फर्ज़ी मिसालों पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त चेतावनी

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न्यायिक प्रक्रिया में AI का जिम्मेदार उपयोग: फर्ज़ी मिसालों पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त चेतावनी

एआई से बनाए गए फर्ज़ी या मनगढ़ंत उदाहरणों (फैसलों की मिसालों) का न्यायिक प्रक्रिया में उपयोग बेहद चिंताजनक है। माननीय सुप्रीम कोर्ट ने Essel Infraprojects दिवालियापन मामले में स्पष्ट किया कि बिना सत्यापन के AI आउटपुट को उद्धृत करना व्यावसायिक कदाचार (Misconduct) है।

अदालतों में Citation Verification Cell या Legal Research Unit की आवश्यकता

केस की पृष्ठभूमि

  • NCLT (28 अगस्त 2024) और NCLAT (11 सितंबर 2025) ने एसेल इन्फ्राप्रोजेक्ट्स की दिवालियापन याचिका पर निर्णय दिए।
  • इन निर्णयों में न्यायाधिकरण ने AI-जनित उदाहरणों पर भरोसा किया, जो बाद में नकली या मनगढ़ंत पाए गए।
  • माननीय सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसे निर्णय "कानून की नज़र में कोई निर्णय नहीं" हैं।

माननीय सुप्रीम कोर्ट की प्रमुख टिप्पणियाँ

  • AI न्यायिक कार्य में सहायक हो सकता है, लेकिन मानवीय न्यायिक विवेक का स्थान नहीं ले सकता।
  • नकली या मनगढ़ंत उदाहरणों पर आधारित निर्णय कानून के शासन को कमजोर करते हैं।
  • न्यायिक प्रक्रिया में प्रामाणिकता, सत्यापन और विश्वसनीयता अनिवार्य हैं।

यह स्थिति क्यों उत्पन्न हुई?

  • AI पर अत्यधिक निर्भरता – बिना स्वतंत्र सत्यापन किए AI आउटपुट को स्वीकार कर लिया गया।
  • AI की सीमाएँ – जनरेटिव AI कभी-कभी Hallucinations अर्थात मनगढ़ंत जानकारी प्रस्तुत कर सकता है।
  • सत्यापन का अभाव – न्यायिक विवेक और तथ्य-जाँच के बजाय सीधे AI आउटपुट पर भरोसा किया गया।
  • कानूनी वैधता का प्रश्न – केवल मानव विवेक, कानूनी परीक्षण और प्रमाणित तथ्यों पर आधारित निर्णय ही वैध माने जाते हैं।

सुप्रीम कोर्ट के प्रमुख निर्णय

  • एआई-जनरेटेड फर्ज़ी मिसालों के उपयोग पर जीरो टॉलरेंस नीति अपनाई गई।
  • ऐसे आधार पर दिया गया कोई भी निर्णय कानून की नज़र में अमान्य (Void) माना जाएगा।
  • NCLT और NCLAT के आदेश निरस्त कर मामले को नए सिरे से सुनवाई के लिए वापस भेजा गया।
  • अंतिम न्यायिक निर्णय में न्यायाधीश का स्वतंत्र विवेक, नियंत्रण और सत्यापन अनिवार्य बताया गया।

इस निर्णय का प्रभाव

  • न्यायपालिका के लिए – यह निर्णय न्यायिक प्रक्रिया की पवित्रता, पारदर्शिता और विश्वसनीयता को सुरक्षित रखने वाली महत्वपूर्ण मिसाल बनेगा।
  • वकीलों और न्यायाधीशों के लिए – भविष्य में AI-जनरेटेड फर्ज़ी उदाहरणों का हवाला देना गंभीर व्यावसायिक और कानूनी परिणाम ला सकता है।
  • कानून के शासन के लिए – तकनीक का उपयोग केवल सहायक भूमिका में होगा, जबकि अंतिम निर्णय सदैव मानवीय विवेक और सत्यापित कानूनी आधार पर ही लिया जाएगा।

माननीय सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश भारतीय न्यायपालिका में AI के उपयोग की स्पष्ट सीमाएँ निर्धारित करता है। यह सुनिश्चित करता है कि न्यायिक प्रक्रिया में मानवीय विवेक, तथ्यात्मक सत्यापन, पारदर्शिता और कानून की सर्वोच्चता हमेशा सर्वोपरि रहेगी।