जामताड़ा, गिरिडीह और देवघर “साइबर अपराध की जननी” के रूप में बदनाम हो चुके हैं। इसके पीछे सामाजिक आर्थिक, भौगोलिक और तकनीकी कारकों का मिश्रण है। इन जिलों के ग्रामीण धोखाधड़ी नेटवर्क छोटे मोटे ओटीपी घोटालों से विकसित होकर अब परिष्कृत एपीके फ्रॉड, निवेश घोटाले और अंतरराष्ट्रीय सिंडिकेट से जुड़े ऑपरेशनों तक पहुँच चुके हैं।
कई मामलों में गहन पूछताछ के दौरान सबसे चौंकाने वाली बात यह सामने आई कि ये अपराधी पीड़ितों से बैंक अधिकारी, बीएसईएस कर्मचारी या पुलिस अधिकारी बनकर बात करते समय असाधारण आत्मविश्वास दिखाते हैं। वे स्क्रिप्टेड बातचीत का पालन करते हैं और इतनी अधिकारपूर्ण शैली में संवाद करते हैं कि पीड़ित को संदेह की गुंजाइश ही नहीं रहती। सबसे ऊपर, उनका लगातार “मार्केट में नया क्या है” तलाशना और नए नए प्लॉट बनाकर लोगों को ठगना उनकी प्रवृत्ति बन चुका है।
कुछ गाँवों में तो साइबर अपराध इतना गहराई से जड़ें जमा चुका है कि लगभग हर व्यक्ति इसी “पोर्टफोलियो” में संलग्न है। झारखंड पुलिस द्वारा हाल ही में सुलझाया गया मामला, जिसमें गिरिडीह में जंगल आधारित साइबर अपराध नेटवर्क को ध्वस्त किया गया और छह आरोपियों को फर्जी एपीके घोटाले चलाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया, इसका एक ज्वलंत उदाहरण है। गिरोह ने सरकारी या यूटिलिटी सेवाओं के नाम पर नकली मोबाइल ऐप्स वितरित किए और सीधे पीड़ितों के बैंक खातों से पैसे siphon किए।
स्थान एवं संचालन
गिरफ्तार आरोपी
कार्यप्रणाली (Modus Operandi)
प्रक्रिया
बरामदगी
जोखिम एवं नागरिक जागरूकता
सावधानियाँ
गिरिडीह अब जंगल आधारित साइबर अपराध का नया हॉटस्पॉट बनकर उभर रहा है, जो पहले जम्ताड़ा में देखे गए पैटर्न की पुनरावृत्ति है। यह ताज़ा कार्रवाई दिखाती है कि अपराधी ठिकानों और तकनीक में लगातार नवाचार कर रहे हैं। ऐसे में नागरिक सतर्कता और त्वरित रिपोर्टिंग ही इन घोटालों का सबसे मज़बूत बचाव है।
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