एआई समिट 2026: भारत ने बदला एआई के प्रति विश्व का दृष्टिकोण

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एआई समिट 2026: भारत ने बदला एआई के प्रति विश्व का दृष्टिकोण

भारत में आयोजित India AI Impact Summit 2026 ने वैश्विक एआई विमर्श को एक नया आयाम दिया है। जहाँ पश्चिमी देशों के हालिया सम्मेलनों (जैसे Bletchley Park, Seoul, Paris) का केंद्रबिंदु मुख्यतः “existential risks” और एल्गोरिदमिक खतरे रहे, वहीं भारत का दृष्टिकोण कहीं अधिक व्यावहारिक, समावेशी और विकासोन्मुखी है।


दृष्टिकोण का तुलनात्मक विश्लेषण

1. Sovereign AI और AI for All – एआई को लोकतांत्रिक और सर्वसुलभ बनाना
2. AI Safety – एल्गोरिदमिक जोखिम, नियंत्रण और अस्तित्वगत खतरे

लक्ष्य:
मानव विकास, पर्यावरणीय स्थिरता, वैश्विक एआई विभाजन को पाटना, तकनीकी नियंत्रण, नियामक ढाँचे और जोखिम-निवारण।


संदेश

  • “Action से Impact” – एआई को ठोस सामाजिक-आर्थिक परिणामों से जोड़ना
  • “Risk से Regulation” – एआई को सीमित और सुरक्षित रखने पर जोर


साइबर सुरक्षा दृष्टि

  • नागरिकों और संस्थानों को सशक्त करना
  • बहुभाषी जागरूकता और डिजिटल समावेशन
  • उच्च-स्तरीय तकनीकी मानक, लेकिन नागरिक-स्तर पर अपेक्षाकृत कम फोकस


वैश्विक भूमिका

Bretton Woods moment for silicon age – भारत को एआई शासन का नया केंद्र बनाना, जबकि पारंपरिक तकनीकी महाशक्तियाँ अपना नेतृत्व बनाए रखना चाहती हैं।


भारत का साइबर सुरक्षा दृष्टिकोण

  • समावेशी सुरक्षा: एआई को केवल तकनीकी विशेषज्ञों तक सीमित न रखकर नागरिकों और छोटे संगठनों तक पहुँचाने पर जोर।
  • बाइलिंगुअल आउटरीच: हिंदी और अन्य भाषाओं में साइबर सुरक्षा जागरूकता सामग्री तैयार कर डिजिटल सुरक्षा को जनसामान्य तक पहुँचाना।
  • प्रायोगिक मार्गदर्शन: SOPs, पोर्टल्स (NCRP vs. CFCFRMS) और फंड रिकवरी जैसे व्यावहारिक पहलुओं को स्पष्ट करना।
  • आशा-आधारित संदेश: RBI के मुआवज़ा पहल और TRAI के एआई-स्पैम ब्लॉकिंग जैसे कदमों को नागरिकों के लिए आशा-प्रेरित मार्गदर्शन के रूप में प्रस्तुत करना।


पश्चिमी देशों से भिन्नता
भारत का दृष्टिकोण “भय से अधिक भरोसा” पर आधारित है। जहाँ पश्चिमी विमर्श एआई को संभावित खतरे के रूप में देखता है, भारत उसे सामाजिक-आर्थिक अवसर और साइबर सुरक्षा सशक्तिकरण का साधन मानता है।

इस परिप्रेक्ष्य में, भारत का एआई दृष्टिकोण साइबर सुरक्षा संस्कृति को नागरिक-केंद्रित, बहुभाषी और आशा-प्रेरित बनाता है, जबकि पश्चिमी देशों का दृष्टिकोण अधिकतर नियामक और जोखिम-निवारक है।