दिल्ली उच्च न्यायालय के माननीय मुख्य न्यायाधीश श्री डी.के. उपाध्याय ने हाल ही में डिजिटल उगाही पर आधारित एक पुस्तक के विमोचन समारोह में इस गंभीर विषय पर महत्वपूर्ण विचार साझा किए।
उन्होंने कहा—
“डिजिटल उगाही हर इंटरनेट उपयोगकर्ता पर एक छाया है।”
यह कथन इस खतरे की सार्वभौमिकता को स्पष्ट करता है। छात्र, गृहिणी, पेशेवर या सेवानिवृत्त व्यक्ति—कोई भी इससे अछूता नहीं है। इंटरनेट ने जहाँ लोगों को सशक्त बनाया है, वहीं यह भय और धोखे का माध्यम भी बन गया है। साइबर अपराधी डिजिटल कमजोरियों का लाभ उठाकर पीड़ितों को डराते, ब्लैकमेल करते और मानसिक दबाव में ले आते हैं।
उन्होंने आगे कहा—
“ये अपराध केवल पुलिस के लिए ही नहीं, बल्कि वकीलों और न्यायाधीशों के लिए भी चुनौतीपूर्ण हैं, क्योंकि अपराधी कानूनी प्रतीकों और प्रक्रियाओं का दुरुपयोग कर पीड़ितों को धोखा देते हैं।”
अब ठग स्वयं को न्यायिक अधिकारी बताकर, नकली गिरफ्तारी वारंट बनाकर और कानून की भाषा का प्रयोग कर भय का वातावरण तैयार करते हैं। अदालत की मुहर, एफआईआर के प्रारूप और आईपीसी की धाराओं के दुरुपयोग से असली और नकली के बीच अंतर करना कठिन हो गया है, जिससे न्यायपालिका की विश्वसनीयता भी प्रभावित होती है।
मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा—
“न्यायपालिका को उन नए साइबर खतरों के अनुरूप ढलना होगा जो एक दशक पहले अकल्पनीय थे।”
उनके अनुसार पारंपरिक ढाँचे अब पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए आवश्यक है कि:
संदेश स्पष्ट है: सतर्क रहें और किसी भी दावे या सूचना पर भरोसा करने से पहले उसका सत्यापन अवश्य करें
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