डिजिटल अरेस्ट घोटाले के मामलों में ज़मानत केवल असाधारण परिस्थितियों में ही दी जाएगी। भारत के माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार (27 जुलाई 2026) को यह स्पष्ट रूप से कहा, उच्च न्यायालयों और ट्रायल कोर्ट को सख्त संदेश देते हुए। न्यायालय ने डिजिटल अरेस्ट धोखाधड़ी को डकैती और लूट के बराबर माना और इसे वरिष्ठ नागरिकों के खिलाफ “सबसे घिनौना अपराध” बताया।
डिजिटल अरेस्ट ज़मानत नीति पर सर्वोच्च न्यायालय
पीठ: भारत के मुख्य न्यायाधीश सुर्या कांत, न्यायमूर्ति जॉयमल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना।
तारीख: 27 जुलाई 2026 (सोमवार)।
मामला: एक आरोपी की ज़मानत याचिका, जिसने दावा किया कि उसने केवल बैंक खाता खोलने में मदद की थी और वह एक वर्ष से अधिक समय से हिरासत में है।
न्यायालय के अवलोकन
डिजिटल अरेस्ट घोटाले = “सबसे घिनौना अपराध”
ज़मानत केवल असाधारण परिस्थितियों में
सह-अपराधी की ज़िम्मेदारी
निचली अदालतों को संदेश
निर्देश और नीति प्रभाव
1. डकैती/लूट के बराबर
2. कड़े कानून लागू करना
3. राष्ट्रीय जांच और समन्वय
4. धोखाधड़ी का पैमाना
महत्व
न्यायिक रुख
निवारण
वरिष्ठ नागरिकों की सुरक्षा
संचालन मार्गदर्शन
सर्वोच्च न्यायालय ने डिजिटल अरेस्ट घोटालों को डिफ़ॉल्ट रूप से गैर-जमानती अपराध घोषित किया है, इन्हें डकैती और लूट के बराबर माना है, और ज़मानत केवल असाधारण परिस्थितियों में ही दी जाएगी। यह निर्णय निचली अदालतों के लिए साइबर धोखाधड़ी मामलों को संभालने का तरीका बदल देता है, जिसमें पीड़ितों की सुरक्षा और निवारण को प्राथमिकता दी गई है।
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