63 वर्षीय सेवानिवृत्त रेलवे अधिकारी को कथित रूप से “डिजिटल अरेस्ट” घोटाले में फँसाया गया। धोखेबाज़ों ने स्वयं को दिल्ली पुलिस, एटीएस और एनआईए के अधिकारी बताकर पीड़ित पर गंभीर अपराधों में संलिप्त होने का आरोप लगाया। लगातार वीडियो कॉल, डराने-धमकाने, परिवार को नुकसान पहुँचाने की धमकी और अलगाव के ज़रिए अपराधियों ने लगभग 25 दिनों तक मानसिक नियंत्रण बनाए रखा और पीड़ित से कई बैंक ट्रांसफरों के माध्यम से ₹1.45 करोड़ वसूल लिए।
यह मामला भारत में साइबर-सक्षम सोशल इंजीनियरिंग अपराधों की बढ़ती जटिलता को दर्शाता है।
धोखेबाज़ों की कार्यप्रणाली (Modus Operandi)
चरण 1: अधिकार स्थापित करना
चरण 2: भय पैदा करना
चरण 3: अलगाव
चरण 4: परिवार को धमकी
चरण 5: वित्तीय शोषण
क्यों ऐसे मामले लगातार होते हैं
सिफारिशें
नागरिकों के लिए
बैंकों के लिए
सरकार और कानून प्रवर्तन के लिए
डिजिटल अरेस्ट घोटाले तकनीकी श्रेष्ठता से नहीं बल्कि भावनात्मक हेरफेर से सफल होते हैं — डर, गलत विश्वास और जागरूकता की कमी। इस खतरे से निपटने के लिए आवश्यक है: जन शिक्षा, बैंकिंग सुरक्षा, त्वरित रिपोर्टिंग प्रणाली और निरंतर साइबर जागरूकता।
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