डिजिटल अरेस्ट धोखाधड़ी: समय पर सूचना मिलने पर बैंक की जवाबदेही और ग्राहक के अधिकार

Helpline

1930 1512 1064 1291 1095, 25844444 1094, 23241210 1093 1091 112 (24X7) (Toll Free) 14547 (Toll Free)

डिजिटल अरेस्ट धोखाधड़ी: समय पर सूचना मिलने पर बैंक की जवाबदेही और ग्राहक के अधिकार

बैंक “डिजिटल अरेस्ट” घोटालों में अपनी ज़िम्मेदारी से नहीं बच सकते। भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की Zero Liability Policy तथा संदिग्ध लेन-देन की निगरानी संबंधी दिशा-निर्देशों के अनुसार, यदि ग्राहक समय पर धोखाधड़ी की सूचना देता है, तो बैंक के लिए तत्काल लेन-देन रोकना, राशि सुरक्षित करना तथा आवश्यक जांच करना अनिवार्य है। ऐसा न करना सेवा में कमी (Deficiency in Service) माना जाएगा और उपभोक्ता आयोग बैंक को पीड़ित की राशि ब्याज सहित लौटाने तथा मानसिक पीड़ा के लिए क्षतिपूर्ति देने का आदेश दे सकता है।

मुख्य बिंदु

RBI Zero Liability Policy (2017)

  • यदि ग्राहक 3 कार्य दिवसों के भीतर धोखाधड़ी की सूचना देता है, तो उसकी शून्य ज़िम्मेदारी (Zero Liability) होती है।

बैंक की ज़िम्मेदारी

  • संदिग्ध खातों और असामान्य लेन-देन पर तुरंत कार्रवाई करना।
  • धोखाधड़ी की सूचना मिलते ही राशि रोकना तथा जांच प्रारंभ करना।

उपभोक्ता संरक्षण

  • बैंक की लापरवाही सेवा में कमी मानी जाएगी।
  • उपभोक्ता आयोग बैंक को राशि लौटाने तथा क्षतिपूर्ति देने का आदेश दे सकता है।

नागपुर उपभोक्ता आयोग का मामला

मामला: Prachi Digambar Dhoke v. ICICI Bank (2023)

मुद्दा

  • पीड़िता को “डिजिटल अरेस्ट” घोटाले के माध्यम से धन हस्तांतरित करने के लिए मजबूर किया गया।

निष्कर्ष

  • ICICI Bank समय पर सूचना मिलने के बावजूद संदिग्ध लेन-देन को रोकने में विफल रहा।

आदेश

  • बैंक को ₹5,18,437 की राशि 9% वार्षिक ब्याज सहित लौटाने तथा ₹25,000 मानसिक पीड़ा के लिए क्षतिपूर्ति देने का निर्देश दिया गया।

बैंक अपनी ज़िम्मेदारी से क्यों नहीं बच सकते

RBI Zero Liability Policy (2017)

  • समय पर सूचना देने पर ग्राहक की कोई ज़िम्मेदारी नहीं होती।
  • बैंक को तुरंत राशि रोकने या ट्रेस करने का प्रयास करना होता है।

संदिग्ध लेन-देन की निगरानी

  • निष्क्रिय खातों में अचानक बड़े लेन-देन होने पर अलर्ट ट्रिगर होना चाहिए।
  • KYC Master Directions (2016) के तहत बैंक को म्यूल (Mule) खातों की पहचान कर उन्हें ब्लॉक करना अनिवार्य है।

उपभोक्ता संरक्षण

  • नियामकीय निर्देशों का पालन न करना सेवा में कमी माना जाएगा।
  • उपभोक्ता आयोग क्षतिपूर्ति का आदेश दे सकता है, भले ही मामले में आपराधिक पहलू भी शामिल हो।

व्यावहारिक निहितार्थ

बैंकों के लिए

  • OTP-अधिकृत लेन-देन होने पर भी, यदि ग्राहक समय पर रिपोर्ट करता है तो उसे दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
  • प्रभावी निगरानी प्रणाली लागू करना तथा संदिग्ध खातों को तत्काल फ्रीज़ करना आवश्यक है।

ग्राहकों के लिए

  • धोखाधड़ी की सूचना तुरंत बैंक, साइबर क्राइम पोर्टल और पुलिस को दें।
  • शिकायत में RBI Zero Liability Policy का उल्लेख अवश्य करें।
  • यदि बैंक राशि लौटाने से इंकार करे, तो उपभोक्ता आयोग में शिकायत दर्ज कर सकते हैं।

निष्कर्ष

बैंक “डिजिटल अरेस्ट” घोटालों में अपनी कानूनी और नियामकीय ज़िम्मेदारी से नहीं बच सकते। यदि ग्राहक समय पर धोखाधड़ी की सूचना देता है, तो उसकी Zero Liability लागू होती है। ऐसी स्थिति में बैंक की लापरवाही सेवा में कमी मानी जाएगी और उसे पीड़ित की राशि ब्याज सहित लौटाने के साथ-साथ आवश्यक क्षतिपूर्ति भी देनी पड़ सकती है।