बैंक “डिजिटल अरेस्ट” घोटालों में अपनी ज़िम्मेदारी से नहीं बच सकते। भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की Zero Liability Policy तथा संदिग्ध लेन-देन की निगरानी संबंधी दिशा-निर्देशों के अनुसार, यदि ग्राहक समय पर धोखाधड़ी की सूचना देता है, तो बैंक के लिए तत्काल लेन-देन रोकना, राशि सुरक्षित करना तथा आवश्यक जांच करना अनिवार्य है। ऐसा न करना सेवा में कमी (Deficiency in Service) माना जाएगा और उपभोक्ता आयोग बैंक को पीड़ित की राशि ब्याज सहित लौटाने तथा मानसिक पीड़ा के लिए क्षतिपूर्ति देने का आदेश दे सकता है।
मुख्य बिंदु
RBI Zero Liability Policy (2017)
बैंक की ज़िम्मेदारी
उपभोक्ता संरक्षण
नागपुर उपभोक्ता आयोग का मामला
मामला: Prachi Digambar Dhoke v. ICICI Bank (2023)
मुद्दा
निष्कर्ष
आदेश
बैंक अपनी ज़िम्मेदारी से क्यों नहीं बच सकते
RBI Zero Liability Policy (2017)
संदिग्ध लेन-देन की निगरानी
उपभोक्ता संरक्षण
व्यावहारिक निहितार्थ
बैंकों के लिए
ग्राहकों के लिए
निष्कर्ष
बैंक “डिजिटल अरेस्ट” घोटालों में अपनी कानूनी और नियामकीय ज़िम्मेदारी से नहीं बच सकते। यदि ग्राहक समय पर धोखाधड़ी की सूचना देता है, तो उसकी Zero Liability लागू होती है। ऐसी स्थिति में बैंक की लापरवाही सेवा में कमी मानी जाएगी और उसे पीड़ित की राशि ब्याज सहित लौटाने के साथ-साथ आवश्यक क्षतिपूर्ति भी देनी पड़ सकती है।
Join Our Group
Like on Facebook
Follow on Twitter
Follow on Instagram
Subscribe On YT
Join Our Channel