भारत में मनोवैज्ञानिक साइबर फ्रॉड

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भारत में मनोवैज्ञानिक साइबर फ्रॉड

डिजिटल अरेस्ट स्कैम से लेकर ट्रेडिंग ट्रैप्स तक: साइबरक्राइम के माइंड गेम्स

भारत में साइबर अपराध का एक बड़ा हिस्सा उन धोखाधड़ी तकनीकों से जुड़ा है जो सीधे पीड़ितों के मनोविज्ञान को निशाना बनाती हैं। यह समस्या किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं है — पढ़े-लिखे डॉक्टर, प्रोफेसर और रिटायर्ड बैंकर्स तक इसका शिकार हो रहे हैं।

इसका मुख्य कारण मोबाइल पर आने वाली अनजान कॉल्स को सही तरीके से न समझ पाना, लगातार संवाद में उलझते जाना और “lack of application of mind” यानी विवेक का क्षरण है।

अब तक सामने आए मामलों से स्पष्ट है कि अधिकांश स्कैम में SIP कॉलिंग का उपयोग किया गया। इन्हें रोकने के लिए दूरसंचार विभाग (DoT) दक्षिण एशिया से आने वाले सिम बॉक्स आधारित कॉल्स पर केंद्रीकृत डिटेक्शन सिस्टम लागू कर सकता है। इसके लिए दूरसंचार सेवा प्रदाताओं के साथ समन्वय, अंतरराष्ट्रीय गेटवे नियंत्रण को सख्ती से लागू करना और IISCPS (International Incoming Spoofed Call Prevention System) व “चक्षु” प्लेटफ़ॉर्म जैसे उपकरण अहम भूमिका निभा सकते हैं।


मनोवैज्ञानिक साइबर फ्रॉड की कार्यप्रणाली
1. डिजिटल अरेस्ट स्कैम का तरीका

  • अपराधी खुद को सरकारी अधिकारी (TRAI, पुलिस, CBI आदि) बताकर कॉल करते हैं।
  • पीड़ित को मनी लॉन्ड्रिंग, टैक्स चोरी या अंतरराष्ट्रीय अपराधों के झूठे आरोपों से डराया जाता है।
  • “कानूनी सुरक्षा” के नाम पर पूरी जमा पूंजी ट्रांसफर करने को कहा जाता है।
  • पीड़ित को मानसिक रूप से अलग-थलग कर दिया जाता है और किसी से बात न करने की हिदायत दी जाती है।
  • कॉल पर लगातार दबाव, धमकी और आधिकारिक भाषा का प्रयोग किया जाता है, जिससे पीड़ित भ्रमित हो जाता है।

2. इस्तेमाल किए जाने वाले मनोवैज्ञानिक हथकंडे

  • Fear Conditioning: कानून का डर और गिरफ्तारी की धमकी
  • Isolation: परिवार और मित्रों से संपर्क रोकना
  • Authority Illusion: कॉलर की आवाज़ और भाषा में अधिकार का भ्रम
  • Cognitive Overload: लगातार कॉल, दस्तावेज़, OTP और ट्रांजैक्शन से मानसिक थकावट


केस स्टडी: साउथ दिल्ली के रिटायर्ड डॉक्टर दंपति

  • साउथ दिल्ली में एक रिटायर्ड डॉक्टर दंपति से ₹15 करोड़ की ठगी हुई।
  • अपराधियों ने TRAI और मुंबई पुलिस के अधिकारी बनकर दो सप्ताह तक कॉल किए।
  • उन्हें बताया गया कि उनके खिलाफ मनी लॉन्ड्रिंग का मामला है और पैसा “सीज़” किया जा रहा है।
  • भय और दबाव के कारण दंपति ने अपनी सारी जमा पूंजी ट्रांसफर कर दी।
  • बाद में मामला IFSO (Intelligence Fusion and Strategic Operations) को सौंपा गया।


अन्य प्रमुख मामले
तिथि                            पीड़ित की प्रोफाइल                             ठगी की राशि                        अवधि
Dec 2025                    85 वर्षीय महिला                                    ₹1.3 करोड़                           1 माह
Nov 2025                    वृद्ध पुरुष                                              ₹1 करोड़                              कुछ दिन
Sept 2025                   73 वर्षीय रिटायर्ड बैंकर                           जानकारी नहीं                          —
March 2025                 90 वर्षीय GK-II निवासी                          ₹3.4 करोड़                             —
Oct 2024                     जापानी प्रोफेसर (दिल्ली)                          ₹7 लाख                                  —

 

मुख्य कारण

  • अनजान कॉल्स को गंभीरता से लेना
  • कॉल काटने के बजाय लगातार संवाद में उलझते जाना
  • डर और भ्रम की स्थिति में विवेक का क्षरण
  • डिजिटल साक्षरता की कमी
  • साइबर फ्रॉड के नए तरीकों की जानकारी का अभाव


समाधान और सुझाव
नागरिकों के लिए

  • अनजान कॉल्स को तुरंत काट दें, विशेषकर जब वे सरकारी अधिकारी बनकर डराएं।
  • किसी भी कानूनी कार्रवाई की धमकी मिलने पर सीधे स्थानीय पुलिस से संपर्क करें।
  • किसी के कहने पर कभी भी पैसा ट्रांसफर न करें।
  • साइबर हेल्पलाइन 1930 पर तुरंत शिकायत दर्ज करें।


निष्कर्ष

भारत में साइबर अपराध अब केवल तकनीकी चुनौती नहीं, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक युद्ध बन चुका है। “डिजिटल अरेस्ट” जैसे स्कैम यह सिद्ध करते हैं कि डर, भ्रम और अधिकार का आभास किसी को भी ठग सकता है। इससे प्रभावी रूप से लड़ने के लिए नागरिकों में सतर्कता, विवेक और साइबर जागरूकता का विकास अत्यंत आवश्यक है।